बुधवार, 12 जनवरी 2011

मुट्ठी भर की ज़िंदगी,चुटकी भर आराम।

मुट्ठी भर की ज़िंदगी,चुटकी भर आराम।
फिर भी करने को पड़े ,दुनिया भर के काम।

4 टिप्‍पणियां:

  1. जब किसी निर्झर की कल-कल रागिनी

    या सागर की हलचल

    शब्दों में साकार हो

    स्वर पाती है

    कविता हो जाती है।

    जब किसी भगीरथ के श्रम से

    पहाड़ों से उतर कोई गंगा

    प्यासे अधरों को सींचती है

    फ़सलों में लहलहाती है

    कविता हो जाती है

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  2. जिसमें अपनापन नहीं,नहीं नेह का लेश.
    ऐसे घटने से रहा ,बैर भाव या द्वेष

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  3. माँ सहज विश्वास है नवल जीवन आस है मलय पवन-सी सदा इक सरस अहसास है दूब-सी पावन दुआ नवल जीवन आस है चाँदनी है चाँद की फूल की सुवास है कुछ अलग लगे मगर न आम है न खास है ...

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