achchha hai
जब किसी निर्झर की कल-कल रागिनीया सागर की हलचलशब्दों में साकार होस्वर पाती हैकविता हो जाती है।जब किसी भगीरथ के श्रम सेपहाड़ों से उतर कोई गंगाप्यासे अधरों को सींचती हैफ़सलों में लहलहाती हैकविता हो जाती है
जिसमें अपनापन नहीं,नहीं नेह का लेश. ऐसे घटने से रहा ,बैर भाव या द्वेष
माँ सहज विश्वास है नवल जीवन आस है मलय पवन-सी सदा इक सरस अहसास है दूब-सी पावन दुआ नवल जीवन आस है चाँदनी है चाँद की फूल की सुवास है कुछ अलग लगे मगर न आम है न खास है ...
achchha hai
जवाब देंहटाएंजब किसी निर्झर की कल-कल रागिनी
जवाब देंहटाएंया सागर की हलचल
शब्दों में साकार हो
स्वर पाती है
कविता हो जाती है।
जब किसी भगीरथ के श्रम से
पहाड़ों से उतर कोई गंगा
प्यासे अधरों को सींचती है
फ़सलों में लहलहाती है
कविता हो जाती है
जिसमें अपनापन नहीं,नहीं नेह का लेश.
जवाब देंहटाएंऐसे घटने से रहा ,बैर भाव या द्वेष
माँ सहज विश्वास है नवल जीवन आस है मलय पवन-सी सदा इक सरस अहसास है दूब-सी पावन दुआ नवल जीवन आस है चाँदनी है चाँद की फूल की सुवास है कुछ अलग लगे मगर न आम है न खास है ...
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